खबरदार ! किसी दुर्बल को कभी मच्छर नहीं कहना

रक्तबीज चोरोंका मन मे, अबवो डर नहीं रहा
हाँ डर के मच्छरों से हरकोई जी रहा
कोनो में बैठ के मस्ती है मारते, थकान नाईट शिफ्टकी दिन में उतारते
दिनरात के मिलन में ये काम पे जाते
हरएक सर पे सौ दोसौ मंडराते
लापरवाह शिकार इन्हें खूब हैभाता
पूरा कुटुम्ब उसके खून का स्वाद है पाता

खुजली की दे सौगात ये चुपके से उड़ जाते
हाय! काटगया मच्छर,कह के हम खुजाते
विज्ञान में मनुष्य ,तरक्की है कर चुका
मच्छर से लेकिन लगभग ये हार ही चुका
DDT का घमंड इसने कब का है तोड़ा
Allout,Mortein ने सर अपना है फोड़ा
कछुए के धुएं को ये धुंध समझते जोड़े समेत पहाड़ो का मज़ा सा लूटते

गुडनाइट पे चड़ के Hit को ये चिढ़ाते
रैकेट से,दो चार बस यूँही मर जाते
रात में है इनका अलग ही अंदाज़
लोरी सी गाके कान में करते हैं ये आगाज़
जो है नहीं ढका हिस्सा ये ढूंढते
चुपके से वहीं लेट के फिर खून हैं पीते
लाचार शिकार कुछ कर नहीं पाता
चादर को खींच सरतक अपनीजान बचाता

कलयुग के रक्तबीज ये कभी कम नहीं होते
मारोगे अगर एक तो सौ उड़ते हैं होते
विनती है सबसे एक , ज़रा ध्यान से सुनना
गलती से, किसी दुर्बल को कभी मच्छर नहीं कहना